संवैधानिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी: जब संवैधानिक प्रक्रिया ही न्याय की प्रतीक्षा बढ़ा दे


संवैधानिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी: जब संवैधानिक प्रक्रिया ही न्याय की प्रतीक्षा बढ़ा दे

संवैधानिक न्यायालयों में रिक्तियां केवल प्रशासनिक आंकड़े नहीं, बल्कि न्याय तक नागरिक की पहुंच की संवैधानिक चुनौती हैं। भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक संविधान की मूल संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय एवं  उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम व्यवस्था विकसित हुई है। इसका उद्देश्य केवल योग्य व्यक्तियों का चयन करना नहीं, बल्कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के बीच आवश्यक संतुलन बनाए रखना भी है।

लेकिन इस व्यवस्था के सामने आज एक गंभीर प्रश्न खड़ा है—क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया अपनी संवैधानिक गरिमा बनाए रखते हुए समयबद्ध भी रह सकती है?

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पद लंबे समय तक रिक्त रहना केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है। इसका सीधा प्रभाव न्यायिक कार्यक्षमता, मामलों की सुनवाई, लंबित मुकदमों और अंततः नागरिक के न्याय पाने के अधिकार पर पड़ सकता है।

20 अप्रैल 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने एम./एस. पी.एल.आर. प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड मामले में इसी समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की रिक्तियों को लेकर नियुक्ति प्रक्रिया के विभिन्न चरणों के लिए समय-सीमाओं की आवश्यकता पर जोर दिया और प्रक्रिया को अधिक समयबद्ध बनाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए।

फिर भी मूल प्रश्न आज भी प्रासंगिक है—

यदि समय-सीमाएं मौजूद हैं, तो नियुक्तियों में देरी क्यों बनी रहती है?रिक्ति की तारीख से बहुत पहले शुरू होनी चाहिए प्रक्रिया उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पद अचानक रिक्त नहीं होता। अधिकांश मामलों में सेवानिवृत्ति की तारीख पहले से ज्ञात होती है। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में पहली चुनौती स्वयं रिक्ति की पहचान नहीं, बल्कि पूर्व नियोजन है।सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को संभावित रिक्तियों के लिए लगभग छह महीने पहले से प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास करना चाहिए।

इसका उद्देश्य यह है कि जिस दिन कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो, उस दिन से नए न्यायाधीश की नियुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ न करनी पड़े। लेकिन छह महीने पहले प्रक्रिया शुरू करने का अर्थ यह नहीं है कि नियुक्ति छह महीने के भीतर अनिवार्य रूप से पूरी हो जाएगी। यही अंतर समझना आवश्यक है।छह महीने की अवधि प्रक्रिया प्रारंभ करने का आधार है, नियुक्ति पूर्ण होने की गारंटी नहीं। यदि छह महीने पहले सिफारिश भेज दी जाती है, लेकिन बाद के किसी चरण में कई सप्ताह या महीने लग जाते हैं, तो रिक्ति फिर भी बनी रह सकती है।

एक सिफारिश, अनेक संस्थाएं और अनेक चरण। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति एक बहुस्तरीय प्रक्रिया है। सबसे पहले उच्च न्यायालय का कॉलेजियम उम्मीदवारों पर विचार करता है। मुख्य न्यायाधीश अपने दो वरिष्ठतम सहयोगी न्यायाधीशों से परामर्श करके सिफारिश तैयार करते हैं।इसके बाद सिफारिश राज्य सरकार के स्तर से गुजरती है। निर्धारित प्रक्रिया में राज्य सरकार की राय के लिए छह सप्ताह की अवधि का उल्लेख है।

इसके बाद खुफिया ब्यूरो द्वारा उम्मीदवार के संबंध में आवश्यक जानकारी और प्रतिवेदन उपलब्ध कराया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में अपेक्षा व्यक्त की थी कि खुफिया ब्यूरो को सिफारिश प्राप्त होने के लगभग चार से छह सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी चाहिए।इसके बाद केंद्र सरकार को राज्य सरकार की राय और अन्य उपलब्ध सूचनाओं पर विचार करके सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम को भेजनी होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्तर पर आठ से बारह सप्ताह की अवधि की अपेक्षा व्यक्त की थी।

इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम उम्मीदवार की उपयुक्तता तथा अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करता है।अंततः सिफारिश केंद्र सरकार के पास जाती है और नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होती है।

ऊपर से देखने पर यह एक सुव्यवस्थित व्यवस्था प्रतीत होती है।समस्या तब उत्पन्न होती है जब हर चरण की निर्धारित अवधि वास्तविक कार्यप्रणाली में समान गति से लागू नहीं होती।

समस्या किसी एक संस्था में नहीं, पूरी प्रक्रिया में है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी का विश्लेषण करते समय किसी एक संस्था को जिम्मेदार ठहरा देना सबसे सरल रास्ता है।लेकिन वास्तविक स्थिति इससे अधिक जटिल है।यदि उच्च न्यायालय का कॉलेजियम सिफारिश देर से भेजता है, तो पूरी प्रक्रिया देर से शुरू होगी।यदि राज्य सरकार अपनी राय समय पर नहीं भेजती, तो अगला चरण प्रभावित होगा।यदि खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट आने में देरी होती है, तो केंद्र सरकार की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।यदि केंद्र सरकार निर्धारित समय में सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम को नहीं भेजती, तो न्यायिक विचार की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती।

और यदि सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम से सिफारिश वापस आने के बाद अंतिम प्रक्रिया में समय लगता है, तो नियुक्ति फिर टल सकती है।इसलिए समस्या को केवल “सरकार की देरी” या “कॉलेजियम की देरी” कहना अधूरा विश्लेषण होगा।वास्तविक समस्या एक ऐसी बहुस्तरीय प्रक्रिया की है, जिसमें एक चरण की देरी अगले सभी चरणों को प्रभावित करती है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न: उत्तरदायित्व किसका है? यहीं नियुक्ति प्रक्रिया की सबसे बड़ी संरचनात्मक समस्या सामने आती है।मान लीजिए किसी उम्मीदवार की सिफारिश उच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने भेज दी।अब प्रश्न होना चाहिए—राज्य सरकार ने अपनी राय देने में कितने दिन लगाए?फिर—खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट कितने दिन में प्राप्त हुई?फिर—केंद्र सरकार ने सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम को कितने दिन में भेजी? फिर— सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने कितने समय में निर्णय लिया? और अंत में—कॉलेजियम की सिफारिश के बाद नियुक्ति की अधिसूचना कितने समय में जारी हुई?

यदि इन प्रश्नों का संस्थागत स्तर पर स्पष्ट अभिलेख उपलब्ध हो, तो देरी के वास्तविक स्रोत की पहचान की जा सकती है।लेकिन यदि केवल इतना बताया जाए कि “प्रस्ताव प्रक्रिया में है”, तो यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि प्रक्रिया वास्तव में किस चरण में लंबित है।है इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया में चरणवार पारदर्शिता और उत्तरदायित्व आवश्यक है। कॉलेजियम और सरकार मिल कर के एक रियल टाइम डैशबोर्ड पर विहार कर सकते हैं जिससे कि सभी को जानकारी मिले कि कौन सी फाइल कहाँ है और किन करों से देरी हो रही ।

इसका अर्थ यह नहीं है कि उम्मीदवार से संबंधित गोपनीय खुफिया सूचनाओं को सार्वजनिक कर दिया जाए। ऐसी जानकारी की गोपनीयता आवश्यक है।लेकिन प्रक्रिया से संबंधित तथ्य—जैसे सिफारिश की तारीख, वर्तमान चरण और किसी चरण में लंबित रहने की अवधि—को संस्थागत स्तर पर दर्ज और नियंत्रित किया जा सकता है।


पुनः सिफारिश के बाद देरी और अधिक गंभीर प्रश्न बन जाती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण स्थिति तब आती है जब सरकार किसी सिफारिश को विशिष्ट कारणों के साथ वापस भेजती है और सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम उस सिफारिश को सर्वसम्मति से पुनः दोहराता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में कहा था कि ऐसी स्थिति में नियुक्ति को तीन से चार सप्ताह के भीतर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इस निर्देश का संवैधानिक महत्व बहुत बड़ा है। यदि कार्यपालिका को किसी सिफारिश पर आपत्ति है, तो उसे अपने कारण रखने का अवसर प्राप्त है। लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम उन कारणों पर विचार करने के बाद सिफारिश को सर्वसम्मति से पुनः दोहराता है, तो उसके बाद नियुक्ति को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना समयबद्ध प्रक्रिया के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।

इसलिए पुनः दोहराई गई सिफारिशों के लिए कठोर समय-सीमा का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

रिक्तियां केवल प्रशासनिक आंकड़े नहीं हैं। विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग के 1 जून 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश के उच्च न्यायालयों में 1,122 स्वीकृत पदों के मुकाबले 789 न्यायाधीश कार्यरत थे और 333 पद रिक्त थे। यह केवल एक संख्या नहीं है।हर रिक्त पद का अर्थ यह नहीं है कि उतने ही मामलों की सुनवाई रुक गई है। न्यायालयों का कार्य केवल स्वीकृत पदों की संख्या के अनुपात में नहीं चलता। न्यायिक कार्यभार को प्रभावित करने वाले कई अन्य कारक भी होते हैं।

लेकिन जब बड़ी संख्या में पद लंबे समय तक रिक्त रहते हैं, तो न्यायिक क्षमता पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।इसका प्रभाव कई रूपों में दिखाई दे सकता है—कार्यरत न्यायाधीशों पर अधिक कार्यभार; मामलों की सुनवाई और निस्तारण पर अतिरिक्त दबाव; निर्णयों के लिए प्रतीक्षा अवधि में वृद्धि; मामलों की सूचीकरण व्यवस्था पर प्रभाव; अधिवक्ताओं और न्यायालय प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव; वादकारियों की प्रतीक्षा अवधि में वृद्धि।

इसलिए रिक्तियों को केवल प्रशासनिक आंकड़े के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

नियुक्तियों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है निरंतरता।न्यायिक नियुक्तियों के संदर्भ में अक्सर प्रश्न पूछा जाता है— “इस वर्ष कितने न्यायाधीश नियुक्त किए गए?” लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है— “उतनी ही अवधि में कितनी नई रिक्तियां उत्पन्न हुईं?”और उससे भी महत्वपूर्ण—“क्या भविष्य में होने वाली रिक्तियों के लिए समय रहते सिफारिशें भेज दी गई थीं?”

यदि किसी वर्ष बड़ी संख्या में न्यायाधीश नियुक्त होते हैं, लेकिन उसी अवधि में लगभग उतनी ही नई रिक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं, तो कुल रिक्तियों की समस्या समाप्त नहीं होगी। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति को वार्षिक अभियान की तरह नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।

यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के कॉलेजियम द्वारा नई सिफारिशें भेजने की निरंतरता पर जोर दिया है और यह स्पष्ट किया है कि पिछली सिफारिशों के परिणाम की प्रतीक्षा में नई सिफारिशों को रोका नहीं जाना चाहिए।

समाधान: नियुक्ति प्रक्रिया को एकीकृत व्यवस्था के रूप में देखना होगा। इस समस्या का समाधान केवल कॉलेजियम और सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप में नहीं, बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में है।

पहला—रिक्तियों की पूर्व योजना प्रत्येक उच्च न्यायालय को आगामी एक वर्ष या उससे अधिक अवधि में संभावित रिक्तियों का व्यवस्थित विवरण तैयार रखना चाहिए। दूसरा—सिफारिशों की चरणवार निगरानी प्रत्येक सिफारिश के लिए यह दर्ज होना चाहिए कि वह कब भेजी गई, किस चरण में पहुंची और उस चरण में कितने समय से लंबित है। तीसरा—समय-सीमा का वास्तविक पालन- जहां सर्वोच्च न्यायालय या निर्धारित प्रक्रिया में समय-सीमा दी गई है, वहां उससे अधिक समय लगने पर कारण अभिलेख में दर्ज होना चाहिए। चौथा—जहां संभव हो, समानांतर प्रक्रिया जहां गोपनीयता और कानूनी आवश्यकताएं इसकी अनुमति दें, वहां विभिन्न प्रशासनिक जानकारियों को क्रमिक रूप से करने के बजाय समानांतर रूप से प्राप्त किया जा सकता है। पांचवां—पुनः दोहराई गई सिफारिशों पर कठोर समय-सीमा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित तीन से चार सप्ताह की अवधि को केवल अपेक्षा न मानकर वास्तविक प्रशासनिक कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। छठा—निरंतर सिफारिशों की व्यवस्थाएक सिफारिश के अंतिम परिणाम की प्रतीक्षा करते हुए अगली संभावित रिक्तियों की सिफारिशों को नहीं रोका जाना चाहिए।

न्याय में देरी की शुरुआत न्यायालय में नहीं, नियुक्ति प्रक्रिया में भी हो सकती है। भारत में “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है” जैसी उक्ति प्रायः मुकदमों की सुनवाई के संदर्भ में प्रयोग की जाती है। लेकिन न्याय व्यवस्था की एक कम चर्चित वास्तविकता यह है कि न्याय देने की संस्थागत क्षमता स्वयं न्यायाधीशों की उपलब्धता पर निर्भर करती है।

न्यायाधीश की नियुक्ति में हुई प्रत्येक देरी को सीधे किसी एक वाद में हुई देरी का कारण नहीं कहा जा सकता। ऐसा निष्कर्ष हर मामले में उचित नहीं होगा। लेकिन जब रिक्तियां बड़ी संख्या में और लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो न्यायिक व्यवस्था की समग्र क्षमता पर उसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति केवल प्रशासनिक नियुक्ति नहीं है। यह न्याय प्रशासन की आधारभूत आवश्यकता है।

संवैधानिक प्रक्रिया की गरिमा के साथ समयबद्धता  भी आवश्यक है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रक्रिया निष्पक्ष, स्वतंत्र और संवैधानिक हो। लेकिन इसके साथ दूसरी आवश्यकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—समयबद्धता। न्यायिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे के विरोधी सिद्धांत नहीं हैं।एक स्वतंत्र न्यायपालिका को अपनी नियुक्ति प्रक्रिया में संस्थागत शुचिता बनाए रखनी चाहिए। कार्यपालिका को भी अपनी संवैधानिक भूमिका निभाते हुए सिफारिशों को अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रखना चाहिए।इसी प्रकार उच्च न्यायालयों के कॉलेजियम को समय पर सिफारिशें भेजनी चाहिए, राज्य सरकारों को अपनी निर्धारित भूमिका समय पर पूरी करनी चाहिए और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं को भी निर्धारित समय-सीमाओं के अनुरूप कार्य करना चाहिए।

अंततः सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि—“देरी किसकी वजह से हुई?” बल्कि वास्तविक संस्थागत प्रश्न यह होना चाहिए— “देरी किस चरण में हुई, कितने समय तक हुई और उसे दोबारा होने से कैसे रोका जाए?” क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में हर अनावश्यक देरी केवल एक सरकारी फाइल को लंबित नहीं रखती। वह न्यायिक संस्थान की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। और जब न्यायिक क्षमता प्रभावित होती है, तो उसका अंतिम प्रभाव उस व्यक्ति पर पड़ सकता है जो अदालत के दरवाजे पर इस विश्वास के साथ आता है कि उसे न्याय मिलेगा।इसलिए उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति को केवल “नियुक्ति प्रक्रिया” के रूप में नहीं, बल्कि न्याय प्रदान करने की संवैधानिक व्यवस्था के अनिवार्य अंग के रूप में देखने का समय आ गया है।

समयबद्ध नियुक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम नहीं करती; बल्कि वह न्याय तक समयबद्ध पहुंच की संवैधानिक प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।

 

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